Saturday, March 2, 2024
HomeLatest Newsलॉक डाउन में स्त्रियों की स्थिति

लॉक डाउन में स्त्रियों की स्थिति

राखी सरोज
दुनिया की आधी आबादी कही जाने वाली स्त्रियां सदैव से ही भेदभाव और अत्याचार को देखती आईं है और बदलाव के लिए आवाज भी उठाती रही है। हम इतिहास काल में रजिया सुल्तान, झांसी की रानी, दुर्गा भाभी जैसी अनेक स्त्रियों की ‌बात करें या फिर आज के समाज में स्त्रियों की बात करें जिन्होंने समाज के लिए हर तबके पर कार्य करा है। हमारे समाज में स्त्रियां हजारों रुकावटों के बाद भी अपने लिए रास्ते खोजती हैं और आने वाली स्त्रियों के लिए प्रेरणा स्रोत बंद कर नए रास्ते तैयार भी करते हैं। हमारे समाज में स्त्रियां घर हो या बाहर प्रत्येक जगह कार्य करती हैं। आज स्त्रियां आपको हर वर्ग में कार्य करती हुई मिल जाती हैं ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां स्त्रियां अपने लिए जगह बनाने में पीछे रही हों। खेती हो या फिर किसी मल्टीनेशनल कंपनी में कार्य करना प्रत्येक कार्य आज हमारे यहां स्त्रियां कर रही है।

स्त्रियों हर रोज अपने विकास के लिए कदम बढ़ा रही हैं। किंतु फिर भी हमारे समाज में आज भी स्त्रियों के साथ भेदभाव करने वाले लोग और विचार दोनों ही जीवित हैं। स्त्रियों के साथ होते अपराधों में बढ़त ऐसे ही विचारों की देन लगते हैं। स्त्रियों को प्रत्येक स्थान पर कार्य करने से रोका जाता है या फिर उन के लिए परेशानियां खड़ी की जाती है। स्त्रियों को मासिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उनके रंग रूप और शरीर के आधार पर उन्हें कार्य करने के योग्य अयोग्य घोषित किया जाता है।

हर मोड़ पर स्त्रियों को रूकावटें का सामना करना पड़ता है, फिर भी वह कोशिश करतीं रहतीं हैं। लेकिन कोरोनावायरस के कारण लगे लॉक डाउन ने पूरे देश वालों के लिए समस्या को बढ़ाने के साथ ही स्त्रियों के लिए बहुत सारी समस्याएं उत्पन्न कर दीं। जिनकी ओर हम सभी ना ही ध्यान दे रहे हैं और ना ही देने की सोच रहे हैं। लॉक डाउन में स्त्रियां भी अपना जीवन सभी की तरह घरों के अंदर ही जी रहीं हैं या फिर यह कहें कि स्त्रियों की तरह हम भी अपना जीवन आज चार दिवारी में गुज़ार रहे हैं।

लॉक डाउन में पुरुष घर के बाहर नहीं जा रहें और ना ही बच्चे। जिसके चलते स्त्रियों के लिए काम पहले के मुकाबले बढ़ गया है। उन्हें पति और बच्चों के बाहर ना जाने के कारण अपने लिए मिलने वाला समय छिन गया है। अब वह पहले से अधिक कार्य कर रही है क्योंकि परिवार के अन्य सदस्यों का उनको अपने कार्य में सहयोग नहीं मिलता है। साथ ही सभी के घर में चौबीस घंटे रहने से उनको अधिक कार्य भी करना पड़ता है।

हमारे देश में स्त्रियां घर और बाहर दोनों स्थानों का कार्य हमेशा से करतीं आईं हैं। इस कार्य को वह बड़ी कुशलता और निपुणता के साथ करतीं हैं। लॉक डाउन में भी वह इस कार्य को करने की कोशिश में पूरे दिन जी जान से लगी रहती है। घर का कार्य हो या बाहर का, स्त्रियां पूरी शिद्दत के साथ कोशिश कर रही है। किन्तु ना ही उन्हें घर के कामों से आराम मिल रहा है और ना ही ऑफिस के कामों से। खासकर मध्यवर्गीय समाज में पितृसत्तात्मक मानसिकता हावी होने की वजह से माना जाता रहा है कि घर की साफ-सफाई, चूल्हा-चौका, बच्चों की देख-रेख और कपड़े धोने का काम महिलाओं का है, पुरुषों का नहीं। जिसके चलते स्त्रियों को ही सम्पूर्ण काम करना पड़ता है।

स्त्रियों को लॉक डाउन में नौकरी और घर दोनों स्थानों का काम करने की ही समस्या नहीं है। उनकी नौकरी खोने का डर और परेशानी का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत में 23.3 प्रतिशत पुरुष और 26.3 प्रतिशत स्त्री कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। लॉक डाउन में आई मंदी के चलते। एक सर्वे के अनुसार जब घर के भीतर नौकरी की बात आती है तो 30.9 प्रतिशत पुरुष और 34.8 प्रतिशत स्त्री कर्मचारियों को नौकरी गंवानी पड़ी है। हमारे देश में पुरूषों की नौकरी जाने से बड़ा आंकड़ा महिलाओं की नौकरी जाने का है। जिसका मुख्य कारण यह है कि भारत में स्त्रियां को पुरूषों के मुकाबले कम आंका जाता है और अधिकतर कम्पनियों के कर्ता-धर्ता बस यही सोचते हैं कि पुरुष हमारा कार्य अधिक अच्छे तरीके से कर सकते हैं।

हमारे समाज में स्त्रियों को सदैव से ही दुसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता है। जिसके कारण उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। लॉक डाउन में यह मानसिक प्रताड़ना ओर अधिक बढ़ गई है। साथ ही घरेलू हिंसा का भी आंकड़ा बढ़ गया है। लॉक डाउन ने बलात्कार जैसे अपराध के आंकड़े कुछ हद तक कम किए हैं लेकिन स्त्रियों के साथ होने वाली घरेलू हिंसा में बढ़त करवा दी है। अब केवल पूराने ही नहीं कुछ नए मामले भी घरेलू हिंसा के सामने आ रहे हैं।

स्त्रियों की स्थिति में लॉक डाउन से कोई सुधार नहीं हुआ है। बस उनकी समस्याएं बढ़ी है। जिसका मुख्य कारण है हमारे देश में स्त्रियो को अपने से कमजोर और निचले तबके का मानने की मानसिकता। हम कोरोनावायरस से बच सकते हैं लेकिन अगर हम ऐसी मानसिक सोच रखेंगे, अपने देश की स्त्रियों के लिए तो कभी भी हम अपने देश को विकसित महाशक्ति नहीं बना पाएंगे। स्त्रियों का विकास हमारे वर्तमान और भविष्य को उज्जवल बनाएं के लिए आवश्यक है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular